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मदिरालय! House of wine.

मदिरालय! इस शब्द का विश्लेषण करें तो इसके अर्थ और भाव में भिन्नता है। यह शब्द ‘मदिरा’ और ‘आलय’ दो शब्दों का मेल है। ‘मदिरा’ एक मादकता युक्त तरल पदार्थ है। और ‘आलय’ स्थान विशेष का सुचक है। जहां मदिरा पीने-पिलाने की व्यवस्था हो, उस स्थान विशेष को मदिरालय कहा जाता है। लेकिन यह जो शब्द है, इसके शाब्दिक अर्थ तक सीमित नहीं है। तैयारक्योंकि मादकता का अर्थ केवल वस्तुजनित नशा नहीं है।

मदिरालय का अर्थ क्या है? जानिए!

शब्दों का जो खेल है, रोचक है। कुछ शब्द ऐसे हैं जो बहुअर्थी होते हैं। एक शब्द है, मधु! यह मदिरा एवम् शहद दोनों के निमित प्रयुक्त होता है। एक मधुरस ऐसा है, जो मीठास से भरा शहद है। यह मानव द्वारा निर्मित नहीं है, परन्तु मानव के लिए उपयुक्त है। यह शारीरिक शक्ति को विकसित करता है। दुसरा जो मधुरस है, वह भी वस्तु जनित रस है। लेकिन यह मानव द्वारा निर्मित किया जाता है। प्रकृति से, पेड़-पौधों से प्राप्त रस को मादक रस में रुपांतरित किया जाता है। यह रस भी मानव के उपभोग के लिए है, परंतु उपयुक्त नहीं है। क्योंकि इससे शारिरिक अथवा मानसिक शक्ति का विकास नहीं होता, अपितु क्षरण ही होता है। इसमें जो मादकता है, क्षणिक है, यह मन को शांत नहीं कर सकता है, अपितु अशांति का कारण बन जाता है।

मधुरस का एक जो स्वरूप है, भावात्मक है। यह मन का विषय है। शब्दकोश में ‘मधु’ शहद भी है, मदिरा भी है। एक और शब्द है, हाला! जो मदिरा के निमित भी प्रयुक्त होता है और सौन्दर्य के आभा को व्यक्त करता है। इन शब्दों का भावात्मक स्वरूप भिन्न है। शहद में मधुरता है, मदिरा में मादकता है, और हाला में सुन्दरता है। मधुरता एक भाव है, मादकता भी एक भाव है, और सुन्दरता भी एक भाव है। भाव मन का विषय है, अतः मधुरस का यह स्वरूप भी मन का विषय है। मधुरता में प्रेम जैसी भावना का समावेश है। और प्रेम में मादकता का भी समावेश होता है। यह जो मादकता है, यह प्रेम का नशा है, भक्ति का नशा है। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि मदिरालय सौन्दर्य, मधुरता एवम् मादकता का केंद्र है। ऐसा सौन्दर्य! जो अप्रतिम है, ऐसी मधुरता! जिसमें प्रेम का भाव है। और ऐसी मादकता! जिसमें प्रेम का नशा है।

यह जो मधुरस है, यह काल्पनिक है, भावात्मक है। मनुष्य के मन की भावनाओं से, उसकी कल्पना से सृजित होता है। और इसे सृजित करने का उद्देश्य मन की शांति है। इसकी मादकता ऐसी है, जो वास्तव में मन को आनंदित कर सकता है।
महाकवि हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में — “मदिरा जिसे पीकर भविष्य के भय भाग जाते हैं और भुतकाल के दारुण दु:ख दुर हो जाते हैं, जिसे पान कर मान-अपमानों का ध्यान नहीं रह जाता और गौरव का गर्व लुप्त हो जाता है, जिसे डालकर मानव अपने जीवन की व्यथा, पीड़ा और कठिनता को कुछ नहीं समझता और जिसे चखकर मनुष्य श्रम, संकट, संताप सभी को भूल जाता है।”

मदिरालय तक जाने और मधुरस पीने की इच्छा सभी को होती है। शारीरिक एवम् मानसिक सुख-शांति की अभिलाषा प्रत्येक के मन निहित होती है। मदिरालय तक जाना और रसपान करना, प्रत्येक के लिए जरूरी भी है। परन्तु चयन महत्वपूर्ण है। किसके मन में किस प्रकार की मधुरस को पीने की इच्छा है, यह पीनेवाले की मानसिक दशा पर निर्भर है! मदिरालय में जो मदिरा है, इसमें जो मादकता है, यह पीनेवाले को बरबाद भी कर सकता है, और आबाद भी कर सकता है।

बच्चन की मधुशाला!

साहित्य जगत में यह शब्द चर्चा का विषय रहा है। मदिरालय को मधुशाला भी कहा गया है। महाकवि बच्चन की एक काव्यकृति का नाम ही ‘मधुशाला’ है। उन्होंने अपनी काव्य रचना में इस शब्द के भावात्मक पक्ष को अभिव्यक्त किया है। बच्चन की ‘मधुशाला’ की जो मादकता है, ग्रहण करने योग्य है।

भावुकता अंगूर लता से
खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है
भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण भर खाली होगा,
लाख पिएं, दो लाख पिएं!
पाठकगण हैं पीनेवाले,
पुस्तक मेरी मधुशाला।
(स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाईयां-४)

इन पंक्तियों में अंगुर लता कवि के मन के पटल हैं। और लताओं से सृजित अंगुर के रस इस पटल पर उभरती भावनाएं हैं। जिसमें से कल्पनाओं का हाला तैयार हुआ है। जिसे साकी के द्वारा कविता रुपी प्याले में डाला गया है। यह जो प्याला है, कभी निरस नहीं हो सकता। इस प्याले में भरी हाला को पीकर कम नहीं किया जा सकता है। यहां साकी और कोई नहीं स्वयं कवि है। और जो हाला-प्याला का केंद्र है, जो साकी, प्याला एवम् पीनेवालों का क्रीड़ांगन है, वही पुस्तक रुपी ‘मधुशाला’ है। इस पुस्तक के पाठक ही मधुरस को ग्रहण करनेवाले हैं।

मधुर भावनाओं की सुमधुर
नित्य बनाता हूं हाला,
भरता हूं इस मधु से अपने
अंतर का प्यासा प्याला;
उठा कल्पना के हाथों से
स्वयं इसे पी जाता हूं;
अपने ही में हूं मैं साकी,
पीने वाला, मधुशाला।
(स्रोत – ‘मधुशाला’, रुबाइयां-५)

महाकवि ने जिस मधुरस की बात कही है, यह भीतर मन में सृजित होता है। भीतर जो भावनाएं हैं, सकारात्मक हैं। इनसे जो हाला निर्मित होती है, मन के प्यास को मिटानेवाली है। यह जो प्यास है मन का! इसलिए है कि शांति की खोज है, सुख की तलाश है। मन इस हाला की मादकता को ग्रहण करना चाहता है, आनंदित होना चाहता है। लेकिन इसके लिए इच्छा के साथ संतुष्टि की कल्पना का होना भी जरूरी है। इस सुखधाम में जो पात्र है, और इसमें जो ग्राह्य त्तत्व है, इसे ग्रहण करने की पात्रता निरंतर अभ्यास से विकसित हो सकती है।

“अपने ही में हूं मैं साकी!” कवि कहते हैं कि साकी भी मैं हूं, पीनेवाला भी मैं हूं और मधुशाला भी मैं ही हूं। यह जो दृष्टांत है, सबके लिए समान रूप से ग्राह्य है। वास्तव में सुख की, शांति की खोज सभी को है। महत्वपूर्ण है कि मन की भावनाएं कैसी हैं। वह शांति की खोज कहां करता है। शांति की खोज का स्थल बाहर है, अथवा वह इसे भीतर खोज रहा है। खोज की जगह वह मदिरालय है, जहां वस्तुजनित मादकता उपलब्ध है। अथवा वह मधुशाला है, जो भीतर अंतरमन में अवस्थित है।

मन के ऊपरी सतह में जो भावनाएं हैं, कामना से युक्त होती हैं। मन के आहत होने का कारण भी उसकी कामनाएं हैं। आहत मन अपनी व्यथा को मिटाने के लिए मदिरालय की ओर उन्मुख हो जाता है। वस्तुजनित मादकता को ग्रहण कर वह मस्त होना चाहता है। लेकिन वहां उसे उस मादकता का अनुभव नहीं हो पाता है, जिसमें मस्ती है। मस्ती तो भीतर के मधुशाला में है। जहां मधुर भावनाओं से मधुरस तैयार होता है।

मन बहुर्मुखी है, इसे भीतर की मधुशाला की ओर प्रवृत्त करना पड़ता है। आनंद के अभिलाषी को अपनी इच्छाशक्ति से मन पर नियंत्रण करना पड़ता है। मन को मन पर ही प्रयोग करना पड़ता है। लेकिन यह अचानक से नहीं हो जाता, इसके लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है। मन ही साकी है, मन ही हाला है, मन ही प्याला है, मादकता मन का ही विषय है, और मधुशाला भी मन में ही स्थित है।

मदिरालय जाने को घर से
चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊं?’ असमंजस
में है वह भोलाभाला;
अलग-अलग पथ बतलाते सब
पर मैं यह बतलाता हूं –
राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला।
स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाइयां ६)

मदिरा को दारू भी कहा जाता है। और गौरतलब है कि दवा-दारू को एक साथ बोलने का चलन भी है। दवा अर्थात् औषधि! जो व्याधि को दुर करता है। तो क्या दारु में औषधीय गुण है! अगर नहीं तो दवा-दारू को एक साथ बोलने का चलन क्यों है? यह जो मन है, नशे में हैं। यह जो नशा है, प्यास मिटाने की नशा है। और मन का जो प्यास है, इसकी इच्छा के कारण है। मन तृप्त होना चाहता है, यह तृप्त होने की नशा इसके स्वभाव में है। लेकिन विडम्बना यह है कि यह तृप्त नहीं हो पाता। इस स्थिति में यह मदिरालय की ओर प्रवृत्त हो जाता है। उस मदिरालय की ओर, जहां दारु है। वहां उसकी व्यथा को मिटाने की दवा नहीं है।

वस्तुजनित सुख पाने की नशा मन को वस्तुजनित मादकता की ओर प्रवृत कर देती है। परन्तु फिर भी उसे वह औषधि नहीं मिलती, जो उसकी व्यथा को दुर कर सके। उसे उस मादकता का अनुभव नहीं हो पाता, जो उसे मस्त कर सके। वास्तव में मन उस मदिरालय में जाना चाहता है, जहां की मदिरा से उसकी व्यथा मिटे। उसके प्यास को मिटाकर उसे तृप्त कर सके। मन स्वस्थ होना चाहता है, तृप्त होना चाहता है, मस्त होना चाहता है। लेकिन उसे उस मदिरालय तक जाने का मार्ग का ज्ञान नहीं है, जहां मस्ती है। ऐसा भी नहीं है कि उस सुखधाम तक जाने का मार्ग नहीं है। एक नहीं अनेक मार्ग हैं। इन राहों पर अग्रसर होने के अलग अलग तरीके भी हैं। इनमें से किसी भी मार्ग पर चलकर उस मदिरालय तक जाया जा सकता है, जहां वास्तविक मादकता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण में वास्तविक जो मधुशाला है, इसे ही सुखधाम, ब्रह्मलोक से संबोधित किया गया है। यह सत्ता स्वयं में मधुरस का स्रोत भी है, साकी भी हैं, और केन्द्र भी हैं। सेवा, भक्ति, पुजा-आराधना, जप-तप, ध्यान -योग, किसी भी एक मार्ग पर चलकर इस प्रभुता के कल्पना को साकार किया जा सकता है। परन्तु इसके लिए इस सत्ता को आभास करने की कल्पना शक्ति की आवश्यकता है। “राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।” यह उक्ति इसी तथ्य को उजागर करती है।

मदिरा पीने की अभिलाषा
ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही
जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते
जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी,
तुझे मिलेगी मधुशाला।
स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाइयां ९)

मन में तृप्त होने की इच्छा जब प्रबल हो जाती है, तो इच्छाशक्ति का रुप ले लेती है। इस इच्छाशक्ति से आनंद की कल्पना की तरंगे उत्पन्न होती है। और मन इस कल्पना में खो जाना चाहता है। यह ध्यान की अवस्था का शुरुआती चरण है। ध्यान करते करते मन एकाकार होने लगता है। यह जो अवस्था है, यही मदिरालय का सुखधाम स्वरूप है। यह आनंद की मादकता का केंद्र है, यहां जो साकी है! आनंद का स्रोत है। जब इस साकी की कल्पना साकार हो जाता है, तो मन आनंद के अवस्था को प्राप्त कर लेता है। फिर न कोई अभिलाषा, ना कोई कल्पना, यहां आनंद ही आनंद है। यह जो आनंदशाला है, यह मन का विषय है, लेकिन मन को इसका आभास नहीं है। इसका कारण वस्तुजनित मादकता में सुख को खोजने की उसकी प्रवृत्ति है।

हाथों में आने से पहले
नाज दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले
अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा
साकी आने से पहले,
पथिक न घबरा जाना,
पहले मान करेगी मधुशाला।
(स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाइयां १३)

किसी भी महान काव्यकृति, ग्रंथ में निहित जो संदेश है, वह एक दो बार पढ़ लेने मात्र से समझ में नहीं आता है। ‘मधुशाला’ की रुबाइयां भी प्रथम दृष्ट्या उलझाती हैं। इसमें उल्लेखित रुबाइयां अरुचिकर भी प्रतीत हो सकता है। क्योंकि जो विषय समझ से परे है, उसके प्रति मन में अरुचि का भाव का आना स्वाभाविक है। या फिर अपनी रुचि के अनुसार ही अर्थ भी लगाया जा सकता है। कवि के मन की भावनाओं को समझने का प्रयास भी मन को उलझा सकता है। क्योंकि ज्ञानियों, मनिषियों के द्वारा अभिव्यक्त भावनाओं को समझ पाना कठिन है। लेकिन पाठक को निराश होने की आवश्यकता नहीं है। वैसे जिज्ञासु पाठक, जो जिज्ञासा की शक्ति के धनी हैं। जिनमें किसी विषय के गहनता में जाकर, उसमें छुपे तथ्य को खोजने की प्रवृति है। उसे वह प्राप्त अवश्य होता है। फिर कवि की कल्पनाओं का संग्रह ‘मधुशाला’ को भी समझा जा सकता है।

हाला! जो कवि की कल्पना है, वही तो रुबाइयों के रूप में व्यक्त हुआ है। हाला! जिसमें आंनद का त्तत्व है, मस्त होने की मादकता है, वही तो प्याले में भरा है। यह अस्थिर आसक्त मन की कल्पनाओं की परिधि में नहीं है। वस्तुजनित सुख की कल्पनाओं में डुबा मन अपनी इन्द्रियों को इस आनंद से भरे प्याले की ओर आकृष्ट नहीं कर सकता है। लेकिन अगर वास्तविक सुखमय स्थिति को प्राप्त करने की इच्छाशक्ति हो, तो इसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रयास के क्रम में मन उलझ भी सकता है। परन्तु निरंतर प्रयास से सुलझ भी सकता है। फिर साकी का प्रत्यक्ष होना भी संभव है, और मधुशाला भी दृश्य हो सकती है।

लाल सुरा की धार लपट-सी
कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको
कह देना उर का छाला
दर्द नशा है इस मदिरा का
विगतस्मृतियां – साकी – हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो,
आए मेंरी मधुशाला।
स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाइयां १४)

यह जो आग की लपटों सी मदिरा की धार है, यह ज्वाला नहीं है। ज्वाला की प्रकृति तो जलाने की है, जलाकर राख कर देने की है। ज्वाला सी दिखने वाली इस मदिरा की धार में तो जलन नहीं है। इसमें तेज है, रोशनी है, इस रोशनी से मन में व्याप्त कालिमा मिटती है। इससे हृदय में छाले नहीं पड़ते, लेकिन दर्द होता है। इसे ग्रहण करने की इच्छा हो तो दर्द सहना पड़ता है। लेकिन यह जो दर्द है, इसमें मादकता है। यह दर्द की मादकता है। जिसे इस पीड़ा में सुख मिलता है, वही इस मदिरालय में आने का पात्र है। इस मदिरालय तक जाने का मार्ग तय करना आसान नहीं है। कांटों भरी इस राह में चुभन है। मोह से ग्रस्त मन में संशय भी है, क्योंकि गंतव्य है, लेकिन इसे इसका आभास नहीं है। वस्तुजनित मादकता से मन को विमुख करना कठिन है।

बने पुजारी प्रेमी साकी,
गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से
मधु के प्यालों की माला,
‘और लिए जा, और पिए जा’ –
इसी मंत्र का जाप करें,
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं,
मंदिर हो यह मधुशाला।
स्रोत – ‘मधुशाला’ रुबाइयां १९)

पीनेवाले मधुरस से भरा प्याला साकी से ग्रहण करते हैं। और पुजारी! जो फल-फूल, मिष्ठान्न आदि का भोग आराध्य को अर्पित करता है। सामान्यत: पूजा एक धार्मिक क्रिया है, जो कामना पूरी होने की कामना के निमित की जाती है। पूजा की क्रिया में एक वो व्यक्ति होता है, जो पूजा करता है। और दुसरे वो होते हैं, जिनके लिए पूजा की जाती है। एक स्थिति यह भी है कि कर्ता किसी और के लिए नहीं, स्वयं के लिए कर्म करता है। पूजा अगर स्वयं के लिए हो, तो पूजारी कोई दुसरा नहीं होता। पीनेवाला अगर प्याले में मधुरस खुद ही डाले, तो साकी कोई दुसरा नहीं होता। महत्वपूर्ण यह है कि मन में जो कामना है, उसका स्वरूप क्या है!

मन की निर्मलता : purity of mind.

वास्तविक जो पूजा है, उसमें मन की निर्मलता की कामना है। यह पुरे मन से आराध्य के प्रति समर्पण की क्रिया है। मन में प्रेम का भाव धारण कर स्वयं को आनंदित करने की क्रिया है। ऐसा जो पुजारी है, उसके कल्पनारुपी हाथों में जो गंगाजल है, प्रेमरस की हाला है। प्रेम, समर्पण जैसे भावों के रस से भरे प्यालों की माला है। ऐसा जो साकी है, बस पीना चाहता है और जीना चाहता है। उसके हृदय का यही उद्गार हैं, उसके लिए यही मंत्र है। ऐसा जो प्रेमी है, वह प्रेम की मादकता में आनंदित होना चाहता है। वह उस आनंद की स्थिति को पाना चाहता है, जो आत्मिय है। यह जो आत्मिय त्तत्व है, यह शिव का अंश है। और यह जो तन है, इस त्तत्व का आलय है, मदिरालय है, मधुशाला है।

पूजा का अर्थ ! Meaning of worship in hindi.

बच्चन की ‘मधुशाला’ में जो मादकता है, वस्तुजनित नहीं है। इसमें जो नशा है, मस्ती है, क्षणिक नहीं है। इस नैसर्गिक मादकता में वास्तविक सुख की खोज है। और मद्यपान करनेवाले वही हो सकते हैं, जो इस मस्ती में खो जाना चाहते हैं। यह जो मदिरालय है! वह केन्द्र है, वह परिवेश है, जहां सौन्दर्य, प्रेम ,भक्ति एवम् वैराग्य का हाला विद्यमान है। यह एक ऐसा सागर है, जो सुख की कल्पना एवम् इसे साकार करने की असीम संभावनाओं की हाला से भरा हुआ है। मदिरालय एक ऐसा शब्द है, जिसके गर्भ में जीवन का सार तत्त्व को खोजा जा सकता है। यह जो सार तत्त्व है, वह हाला है, जिसकी मादकता में अलौकिक मस्ती है।

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