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ऐसी लागी लगन ..!

मीरा की लगन ऐसी ही थी, उनकी मन की लहरें प्रेम के सागर में मिलने को उमड़ पड़ी। आत्मा जब परमात्मा से साक्षात्कार के लिए तड़प उठती है, तो ऐसा ही कुछ घटित होता है। जैसा कि मीरा के जीवन में घटित हुवा था। 

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ब्रम्ह मुहूर्त एवम् संध्याकाल।।

जागृत होने के लिए, ध्यान, साधना के लिए जो उपयुक्त बेला है, ब्रम्ह मुहूर्त है। और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करने का समय संध्याकाल है।

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जागने का मुहूर्त क्या है?

जीवन को किसी विशिष्ट दिशा की ओर अग्रसर करना हो, तो विशेष प्रक्रियाओं का अभ्यास जरूरी हो जाता है। इसके लिए जागने का मुहूर्त भी विशेष हो जाता है।

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नर हो न निराश करो मन को …

नर हो न निराश करो मन को – मैथिली शरण गुप्त की एक कविता की पंक्ति है। इसमें ‘नर’ एवम् ‘निराश’ दो शब्दों पर ध्यान आकर्षित किया गया है। एक और शब्द ‘मन‘ है, निराश होने का संबंध मन से ही है। मन ही निराश होता है, जब उसकी आश पूरी नहीं होती, तो वह

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चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनकर लौटे ।।

चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनके लौटे- छब्बे बना जा सकता है, आत्मज्ञान को पाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए पाठक बनना होगा, सीखना होगा, जानना होगा। तभी यह संभव है, वर्ना उन्नति संभव नहीं, दुबे बनकर लौटना पड़ेगा।

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जहां चाह वहां राह ।।

जहां चाह वहां राह – बात सही है। पर जहां चाह नहीं है, वहां भी राह है। एक और राह , जो साधारण मनुष्य को दिखाई नहीं देता। और जिसपर चलकर समस्त दुखों से छुटकारा मिल सकता है …

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