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मैं कौन हूं..?

मैं कौन हूं? खुद को संबोधित करने के लिए ‘मैं’ का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतः ‘मैं’ का भाव मन का विषय है। यह जो भाव है, इंद्रियों के द्वारा पोषित होता है। सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में इसका उत्तर उसके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। इन्द्रिय जनित अनुभव सामान्य व्यक्ति के दृष्टि में सत्य […]

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व्यथा – कारण और निवारण।

वह ज्ञान जिसके प्राप्त होने से मन को व्यथा से मुक्त किया जा सकता है। क्या उस ज्ञान को खोजा जा सकता है? ज्ञानियों की मानें तो यह संभव प्रतीत होता है।

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करम का लेख मिटे ना रे भाई।

करम का लेख का तात्पर्य क्या है? करम का लेख! अर्थात् कर्म अथवा कार्य के विषय में लेख। किसी भी तथ्य के विषय में  लिखा जाता है, तो उस पर लेख तैयार हो जाता है। लेख का संबंध लेखन से है, लिखने की क्रिया से है। और कर्म कुछ करने का भाव अथवा अवस्था है।

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ताड़ना का अर्थ क्या है?

ताड़ना एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग एक से अधिक संदर्भों में किया जाता है। ताड़ना एक क्रिया है, जिसका संबंध दो विपरीत मनोभावों से है। एक भाव है, जो चीजों को परखने, समझने की क्रिया को दर्शाता है। वहीं जो दुसरा भाव है, वह किसी पर आघात करने, किसी को अपमानित करने की क्रिया

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मानो तो देव, ना मानो तो पत्थर!!

मानो तो देव! इस कथन का आशय क्या है?  ‘देव’ अर्थात् परमात्मा! इस कथन का आशय है कि मानो तो परमात्मा है। यह बात मान लेने की है, इसलिए कि परमात्मा अदृश्य है। हर जगह, हर चीज में परमात्मा है, लेकिन दिखाई नहीं देता। जो अप्रत्यक्ष होता है, उसके विषय में संदेह बना रहता है। 

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सवाल पर सवाल..!

सवाल क्या है? सवाल पर सवाल! यानि सवाल यह है कि सवाल क्या है? आइए यह जानने का प्रयास करते हैं कि सवाल क्या है? सवाल उर्दू भाषा का एक शब्द है। सवाल का ताल्लुक जानकारी से है। जब किसी विषय पर जानकारी का अभाव होता है, तो उस विषय पर जानने की चाहत भी

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ईर्ष्या या बैर !!

ईर्ष्या या बैर मन के भाव हैं। ईर्ष्या में जलन का भाव है, और बैर में शत्रुता का भाव है। दोनों ही नकारात्मक भाव हैं, परन्तु भिन्न भिन्न स्वरुप में परिलक्षित होते हैं। वस्तुत: ईर्ष्या का ही परिवर्तित रुप बैर है। जब किसी किसी की उन्नति देख मन आहत हो, तो यह भाव ईर्ष्या है।

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वाणी की प्रकृति!

वाणी की प्रकृति का आशय क्या है? वाणी मुख के बोल हैं, मुख से प्रगट होनेवाले शब्दों से जो ध्वनि उत्पन्न होती है, वाणी की संज्ञा दी गई है। मनुष्य के तन में जो इंद्रियां हैं, वो मन के अनुसार कार्य करती हैं। मन जो चाहता है, जैसा चाहता है, वही करना पसंद करता है।

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